पण्डित मुकुटधर पाण्डेय के साहित्य में लोक-चेतना का अनुशीलन
श्री बीरू लाल बरगाह1, डाॅ. जयपाल सिंह प्रजापति2
1शोधार्थी, पण्डित सुन्दरलाल शर्मा (मुक्त) वि.वि. छत्तीसगढ़, बिलासपुर
2विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग पण्डित सुन्दरलाल शर्मा (मुक्त) वि.वि. छत्तीसगढ़, बिलासपुर
*Corresponding Author E-mail: harishgeetu27@gmail.com
शोध सारांश:
पण्डित मुकुटधर पाण्डेय संक्रमण काल के सामथ्र्यवान कवियों में से एक हैं । वे द्विवेदी युग एवं छायावादी युग के बीच की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी हैं जिनकी काव्य यात्रा को समझे बिना खड़ी बोली के विकास को सही रूप में नहीं समझा जा सकता। उनश्यास्वी साहित्यकारों में से पाण्डेय जी एक है जिन्हें हिंदी में उनकी कुछ रचनाओं से ही यथेष्ट ख्याति मिल गई । पाण्डेय जी की प्रसिद्ध रचना ‘कुररी के प्रति’ तथा ‘छायावाद’ लेख चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी की कहानी ‘उसने कहा था’ की तरह अमर रचनाएँ हैं । पण्डित मुकुटधर पाण्डेय ही छायावाद के जनक हैं ।
शब्दकुजींः शर्दुल=सिंह, तन्द्रा=हल्की नींद, थकान, भगिनी=बहन लख=देखकर कुररी=प्रवासी पक्षी क्रन्दन=विलाप करना, रोना तजकर=त्यागकर
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परिभाषा
1) डाॅ वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार-‘‘लोक हमारे जीवन का महासमुद्र है जिसमें भूत, भविश्य और वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है । ‘लोक’ ही राष्ट्र का अमर स्वरूप है ।’’1
2) तुलसी शब्द कोश में ‘लोक’ का अर्थ ‘‘दृष्यमान जगत एवं लोग’’ से लिया गया है ।2
‘चेतना’ शब्द का प्रयोग बुद्धि, ज्ञान, होश, समझना, विचारना, स्मृति, मनोवृत्ति, चेतनता, सुधि आदि वृहद अर्थों में लिया गया है ।
परिभाषा:
डाॅ अम्बलगे के अनुसार- चेतना प्राणी में निहित वह शक्ति है जो उन्हें चैतन्यमय बनाकर सजीव सिद्ध करती है ।’’3
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर ‘‘लोक-चेतना’’ एक ऐसी दृश्टि है जो अपने युग (समय) का निरीक्षण कर वास्तविकता को संपूर्ण समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। लोक-चेतना अपने समय का दर्पण है जो समाज का अपने युग का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है।
पण्डित मुकुटधर पाण्डेय के काव्य में लोक-चेतना: पाण्डेय जी के अनुसार सार्थक साहित्य वह है जिसमें लोक हित एवं समाज कल्याण की भावना निहित हो। जिस साहित्य में लोक-चेतना के माध्यम से लोकहित का उद्देष्य न हो वह साहित्य निरर्थक है, उद्देष्यहिन है। पाण्डेय जी के अनुसार कविता ऐसी हो जो जनता को जागृत कर उनके सुप्त भावों को जगा सके, उनके मन मस्तिश्क को झकझोर कर रख दें। पाण्डेय जी ने लोक-चेतना हेतु काव्य को गद्य की अपेक्षा अधिक प्रभावषाली साधन स्वीकार किया है। पाण्डेय जी ने वैयक्तिक, सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय चेतना आदि विशयों को माध्यम बनाकर लोगों को जागरूक करने का भरपूर प्रयास किया है।
पाण्डेय जी के काव्य संग्रह ‘पूजाफूल’ में राश्ट्रभक्ति, प्रकृति, प्रेम और वैयक्तिक चेतना को देखा जा सकता है । पाण्डेय जी शांति प्रकृति के इन्सान थे, लेकिन जहाँ अन्याय, अत्याचार देखते थे वहाँ सटीक वक्तव्य कहने से नहीं चूकते थे। चीन आक्रमण के समय वे बहुत उत्तेजित हुए। उन्होंने ‘रणाह्नान’ शीर्शक कविता लिखकर नवजवानों का आह्वान इन शब्दों में किया -
‘‘हे अमृत के पुत्र
हे पुरूष शार्दुल हे रणवीर
छोड़कर तन्द्रा उठो तत्काल
एक पल न विलम्ब का है काल
खुल गया यह स्वर्ग का है द्वार
लो लपक कर हाथ में तलवार।’’4
शक्तिपरक कविताएँ जिसमें राष्ट्रहित की कामना की गई है। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः को चरितार्थ करते हुए सभी देशवासी चरित्रवान बनें, सब का जीवन सुखी हो जाए -
‘‘दीजै हमें विमल भक्ति विभो ! तुम्हारी ।
कीजै विनाष दुःख पाप कुबुद्धि सारी ।।
होवै सुखी निज सभी गुरू बन्धु मित्र ।
भ्राता तथा भगिनी आदि सच्चरित्र ।।’’5
गाँव में भिनसारे कुलवधूएँ समूह में कार्तिक स्नान करती हैं। यहाँ प्रकृति और मनुश्य का सुखद साहचर्य दर्षनीय है। यहाँ पाण्डेय जी ने लोक-चेतना का सुन्दर चित्र उकेरा है -
‘‘कुल वधुएँ करती हैं स्नान
होता कैसा मंगल गान ।’’6
पाण्डेय जी ने मानव स्वभाव की सुन्दर व्याख्या की है। उनके अनुसार मानव गुणों की ओर ध्यान न देकर उनकी प्रथम दृश्टि अवगुणों की ओर जाती है। ऐसा करके वे अपने अहं की पुश्टि करते हैं। ‘गुलाब’ कविता के माध्यम से कवि अवगुणों को त्यागकर सद्गुणों को ग्रहण करने की बात कही है
‘‘ऐ गुलाब। फूलों का राजा, है तू सर्वगुणों की धाम।
पर दुर्जन तेरे कांटे लख, तुझे समझते है बेकाम।।’’7
बढ़ते हुए औद्योगीकरण और पूँजीवादी सभ्यता के परिणामस्वरूप कृशकों और श्रमिकों की दीन-हीन दषा का चित्रण निम्न पंक्ति के माध्यम से करते हैं -
‘‘भारत का यह कृशक खेत में कठिन काम करता है
किन्तु वर्श में कई महिने भूखा ही रहता है ।’’8
ग्राम गुण-गान कविता के माध्यम से कवि ने नगरों की अपेक्षा ग्रामों की महत्ता पर प्रकाष डालते हुए पाण्डेय जी लिखते हैं।
‘‘नगरों में रहता था मैं, मुझको ग्राम न भाता था
छोड़ ग्राम नगरों में रहना, मुझे नहीं अब भाता है ।’’9
मेरा प्रकृति प्रेम कविता के माध्यम से कवि ने प्रकृति को मनुश्य जीव-जन्तु सभी के लिए महत्वपूर्ण बताया है । प्रकृति की अनुपस्थिति में मनुश्य और समस्त जीवों का कोई अस्तित्व नहीं है ।
‘‘इन्हें देखकर मन मेरा प्रसन्न होता है ।
सांसारिक दुख ताप सभी छिन मेें खोता है ।’’10
कवि की कल्पना अत्यंत सुन्दर है। वे कोयल के माध्यम से मानव को मधुर वचन बोलने का संदेष देते हैं। वे सुन्दरता की अपेक्षा गुणवत्ता को अधिक महत्व देते हैं -
‘‘गुण उजागरी, मधुर भाशिणी, यह कोयल अति प्यारी है । इसकी ताने न्यारी भारी, सुधि तक भी सुखकारी है।’’11
‘कुररी’ कविता के माध्यम से मनुश्य की व्याकुलता को रम्य और अद्भूत कल्पना द्वारा अभिव्यक्ति देने में कवि अधिक सफल रहा है।‘कुररी के प्रति’ छायावाद की प्रथम कविता है -
‘बता मुझे ऐ विहग विदेषी अपने जी की बात ।
पिछड़ा था तू कहाँ, आ रहा जो कर इतनी रात।’’12
‘कुररी’ प्रवासी पक्षी के माध्यम से कवि ने ‘‘अतिथि देवो भव’’ की भावना को चरितार्थ किया है।
गायों की रक्षा हेतु, उनके सही तरीके से देखभाल, रख रखाव हेतु कवि लोगों से प्रार्थना करते हैं । गायों की दषा सुधारने हेतु आह्वान करते हैं -
‘‘दे दुख गो को नर जो कदापि, है लोक में सो अति, नीच पापी । विपत्ति से उन्हें शीघ्र उबारो, गो वंष की मित्र दशा सुधारो ।।’’13
कवि प्राकृतिक उपादानों से अपना सामंजस्य स्थापित कर लेता है। ऐसी दशा में आवष्यक है कि कवि को सरिता की कल-कल निनाद ने आत्मविभोर कर दिया है वह अपना परिचय दे। पाण्डेय जी महानदी की कल-कल निनाद से प्रष्न करते हैं -
‘‘शीतल स्वच्छ नीर ले सुन्दर, बता कहाँ से आती है?इस जल्दी में महानदी तू, कहाँ घूमने जाती है?’’14
कवि कहते हैं विद्या के अभाव में मनुश्य, मनुश्य न होकर पषु तुल्य बन जाता है और प्रत्येक स्थान पर अपमान पाता है । इस पंक्ति के माध्यम से कवि ने विद्या के महत्व का प्रतिपादन किया है -
‘‘विद्या बिन नर पषु समान पाते ठौर-ठौर अपमान।।
विद्या सम धन है नहिं आन, विद्या अर्जन करो सुजान।।’’15
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है इस भावना को साकार करते हुए इस पंक्ति के माध्यम से कवि जगत का कल्याण करना चाहते हैं -
‘‘लेकर जन्म जहाँ सुख पाया, अन्न शाक है जिसका खाया । उसे कभी मत जाना भूल, जन्मभूमि जो सुख का मूल।।’’16
कवि के अनुसार हमारा जीवन तभी सफल हो सकता है जब हम सार्थक जीवन जीते हैं । जिस उद्देष्य हेतु हमारा जन्म हुआ है उस उद्देष्य की प्राप्ति हेतु हम प्रयास करते हैं -
‘‘सदाचार सद्गुण से जिसने सब प्रकार नाता जोड़ा।
दुराचार दुर्गुण, दुरितों से जिसने अपना मुंह मोड़ा।’’17
प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि संसार की नष्वरता को प्रकट करते हुए कहते हैं कि समय बहुत कीमती है इसे व्यर्थ में बर्बाद न करें -
‘‘उत्साह से था हो रहा सुख साज अति सुन्दर जहाँ।
देखो अभी ही मच गया है दुःख का क्रन्दन वहाँ।।’’18
कवि कहते हैं मनुश्य को प्रकृति, पेड़-पौधे, गाय के समान परोपकार करते हुए जीवन जीने की प्रेरणा दे रहे हैं -
‘‘परोपकारार्थ बनी, विचार जो सृष्टि सारी यह दृष्टि आती है। संसार में परमार्थ सार, है अन्तरात्मा हम को सिखाती है ।’’19
पाण्डेय जी कहते हैं कि यह संसार क्षणिक है नष्वर है अतः इस संसार में जन्म लेकर अच्छे कर्म करना चाहिए।
‘‘यह बाजार अचल है कहकर, हम सब करते नित्य गुमान। क्रम-क्रम घटती आयु हमारी, इसका हमको जरा न ज्ञान।’’20
पाण्डेय जी कहते हैं कि ईष्वर का निवास दबे, कुचले हुए लोगों के आँसू रूपी जल में दुखियों के पीड़ा, संताप में, संध्या के समय चलने वाली हवाओं में, प्रकृति के कण-कण में ईश्वर का निवास है । हमें इनका सम्मान करना चाहिए -
‘‘दीन हीन के अश्रु नीर में,
पतितो के परिताप पीर में,
संध्या के चंचल समीर में,
करता था तू गान ।’’21
ग्राम्य जीवन का चित्रण करते हुए कवि ने पनघट और पनिहारिनियों का सुन्दर चित्रण किया है । इस पंक्ति में लोक-चेतना दृश्टव्य है -
‘‘पनिहारिन पानी लेने को पंक्ति बाँधकर जाती है ।
सिर पर नीर पूर्ण मिट्टी के कलसे ले ले आती है।।’’22
पाण्डेय जी ने नये-नये तरीकों को अपनाकर पैदावार बढ़ाने और अपने देष के कृशकों को समृद्धषाली बनने की प्रेरणा निम्न पंक्ति के माध्यम से देते हैं -
‘‘रोपा की तरकीब सीखकर अपनी उपज बढ़ावे हम।
चकबन्दी कर खेत कमावें, उनको सरस बनावे हम।
अपनी फटी लंगोटी तजकर धोती कोट सजावें हम।।’’23
पाण्डेय जी कहते हैं कि समय बड़ा बलवान होता है । वह राजा को रंक व रंक को राजा बना देता है -
‘‘प्राणी जो कल था प्रसन्न मुख से आमोद में लीन हो। देखो तो किस भाँति आज फिरता रोता वही दीन हो।।’’24
उपर्युक्त पंक्तियों के माध्यम से स्पश्ट है कि पाण्डेय जी का साहित्य लोक-चेतना से ओतप्रोत है। अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से पाण्डेय जी ने जनजागृति लाने का हर संभव प्रयास किये हैं।
पण्डित मुकुटधर पाण्डेय के गद्य साहित्य में लोक-चेतना:
पाण्डेय जी उन व्यक्तियों में से नहीं हैं जिन्होंने केवल साहित्य का सृजन किया अपितु वे उन व्यक्तियों में से एक जिन्होंने अपना अपना संपूर्ण जीवन जनता के लिए समर्पित कर दिया । पाण्डेय जी का यही संदेष था कि ‘‘साहित्य ऐसा हो जो जनता को जागृत कर सके समाज को ऊपर उठने की प्रेरणा दे ।’’25
1) कवि और उसका चरित्र: इस निबंध के माध्यम से कवि और उसके चरित्र को प्रकाषित किया है । कवि का स्थान बहुत ऊँचा होता है । कवि ईश्वरीय विभूति सम्पन्न होते हैं। उनकी रचनाएँ संसार को दृष्टि प्रदान करती है और संसार के लिए स्थायी सम्पत्ति समझी जाती है। उनकी रचनाओं में प्रतिभा की प्रभावषाली किरणें निकलती हैं जो मनुष्य को संकीर्ण विचारों से मुक्त कर व्यापक दृश्टिकोण प्रदान करती है ।
कवियों में कुछ दुर्गुण भी पाये जाते हैं जैसे विलासिता, आमोद प्रियता आदि। पाण्डेय जी ने इस निबंध के माध्यम से नवयुवकों से अनुरोध करते हैं कि वे कवियों के गुणों को अपनायें और अपने जीवन को सफल बनावें । कवियों के दुर्गुणों से सदैव दूर रहें ।
2) कविता: कविता शीर्षक निबंध में पाण्डेय जी ने नवयुवक कवियों के लिए एक आदर्ष प्रस्तुत किया है। पाण्डेय जी का कथन है कि ‘‘कविता में सफलता प्राप्त करने के लिए विशय निर्वाचन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। कवि का काम सोती हुई जनता को जागृत करना, अंधकार पूर्ण विशयों पर प्रकाष डालना, मोहान्ध-लोगों को उचित मार्ग पर लाना उन्हें उनकी आवष्यकताएँ सुझा देना इत्यादि । इन उद्देष्यों को ध्यान में रखकर कविता का विशय चुनना चाहिए ।’’26
बड़े से बड़े वक्ता, नेताओं, समाज सुधारकों के लम्बे लम्बे भाषण जो काम नहीं कर सकते वह काम एक छोटी सी कविता आसानी से कर सकती है ।
3) ‘भविष्यत् में हिंदी का रूप क्या हो ?’ः इस निबंध के माध्यम से पाण्डेयजी ने भाशा को उन्नत बनाने उसके शब्द भण्डार का विस्तार करने पर जोर दिया है। शब्द समूह को बढ़ाने के लिए पाण्डेय जी ने दो उपाय सुझाए हैं - पहला नये शब्दों को गढ़ना और दूसरा विदेशी शब्दों को ग्रहण करना। वे हिंदी भाषा के पक्षधर थे परंतु उसे संकीर्णता छोड़ उदार बनाने के भी पक्षधर थे ।
4) पण्डित मुकुटधर पाण्डेय जी के अनुदित गद्य साहित्य में भी लोक-चेतना की महक है। उन्होंने उड़िया भाशा के साहित्यकार फकीर मोहन सेनापति के उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया और जनता को जागृत करने का प्रयास किया है। ‘लच्छमा’, ‘समाज कष्टक’ या ‘मामा’ तथा ‘शैलबाला’ प्रमुख अनुदित उपन्यास है ।
‘लच्छमा’ ऐतिहासिक उपन्यास है जिसमें बर्गियों द्वारा बंगाल और उड़ीसा पर किए गए अत्याचार की गाथा है। मराठों को बर्गी कहा जाता था। बर्गियों के आतंक को रोकने का साहस कोई नहीं करता था। ऐसे में वीरांगना लच्छमा जो पतिव्रता, साहसी धैर्य की प्रतिमा है अपने पति बादलसिंह के साथ मिलकर युद्ध करती है और बर्गियों को परास्त करती है। प्रजावत्सला दिखाते हुए लच्छमा और बादल सिंह सुखपूर्वक राज्य करते हैं।
‘शैलबाला’ उपन्यास में एक नारी की व्यथा कथा का वर्णन है। पतिव्रता, सशीला, आदर्श नारी होने के बावजूद शैलबाला को उनके कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अपने विनम्र स्वभाव प्रेम, दया, सहानुभूति करूणा आदि सद्गुणों के माध्यम से कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करती है। इस उपन्यास के माध्यम से पाण्डेय जी ने नारी की असीम शक्ति का परिचय दिया है।
‘मामा’ उपन्यास भी एक सामाजिक समस्याओं पर आधारित उपन्यास है। जमींदार की मृत्यु के पष्चात् उसके बच्चों का अभिभावक उसका मामा बनता है। मामा उनकी संपत्ति को हड़पकर खूब ऐय्याषी करता है। बाद में उसे अपनी करनी का फल भुगतने के लिए जेल की सजा मिलती है उसे अपने अपराधों पर पष्चाताप होता है और वह वह ईष्वर को याद करता हुआ अपने पापों का प्रायष्चित करना चाहता है।
ऐसा ही एक कहानी ‘हृदयदान व प्रायष्चित’ है जो सामाजिक अव्यवस्था, रूढ़ियों एवं परंपराओं पर आधारित है। किशोरी और उसके पति मन्मथ की कहानी है। दोनों का एक-दूसरे के प्रति अथाह प्रेम अचानक घृणा एवं क्रोध में बदल जाता है। उन्हें स्वयं पता नहीं चलता। इस दुखमय जीवन के लिए वे दोनों दोशी नहीं है, दोश तो निर्दयी समाज का और उनके माता-पिता के अहं भाव का हैं जिसकी चक्की में पीसकर मन्मथ और किषोरी का जीवन पीस कर तबाह हो जाता है और वे आत्महत्या जैसे घृणित कार्य कर बैठते हैं । फिर भी सोए हुए समाज को जगाने में असमर्थ रहते हैं ।
उपर्युक्त वर्णन से स्पश्ट है कि पाण्डेय जी ने अपने साहित्य में लोक-चेतना के माध्यम से देष समाज को एक नयी दृश्टि देने का प्रयास किया है । उन्हें समाज में जागृति लाने में पर्याप्त सफलता भी मिली है। उन्होंने स्वच्छ एवं निर्मल समाज के स्वप्न को साकार किया ।
संदर्भ सूची:-
1ण् समसामयिक संदर्भों के निकश पर पं. मुकुटधर पाण्डेय व डाॅ. विमल कुमार पाठक के साहित्य का तुलनात्मक अनुषीलन डाॅ. रंजना मिश्रा । पृ. क्र. 132-133
2ण् समसामयिक संदर्भों के निकश पर पं. मुकुटधर पाण्डेय व डाॅ. विमल कुमार पाठक के साहित्य का तुलनात्मक अनुषीलन डाॅ. रंजना मिश्रा। पृ. क्र. 132-133
3ण् समसामयिक संदर्भों के निकश पर पं. मुकुटधर पाण्डेय व डाॅ. विमल कुमार पाठक के साहित्य का तुलनात्मक अनुषीलन डाॅ. रंजना मिश्रा । पृ. क्र. 132-133
4ण् छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 86
5ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 61
6ण् छायावाद और पं. मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 34
7ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 25
8ण् छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय संपादक डाॅ. बलदेव पृ. क्र. 32
9ण् छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय संपादक डाॅ. बलदेव पृ. क्र. 36
10ण् पण्डित मुकुटधर पाण्डेय चयनिका प्रो. दिनेष पाण्डेय डाॅ. बिहारीलाल साहू पृ.क्र. 21
11ण् पूजाफूल पृ. क्र. 28
12ण् छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय संपादक डाॅ बलदेव पृ. क्र. 74
13ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 68
14ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 30
15ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 29
16ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 43
17ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 97-99, जीवन साफल्य पं. मुकुटधर पाण्डेय चयनिका डाॅ. बिहारीलाल साहू पृ. क्र. 26
18ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 51
19ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 47
20ण् पूजाफूल मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 57
21ण् विष्वबोध मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 75
22ण् पं. मुकुटधर पाण्डेय व्यक्तित्व एवं कृतित्व संपादक नंदकिषोर तिवारी पृ. 102
23ण् पूजाफूल पं. मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 152
24ण् पूजाफूल पं. मुकुटधर पाण्डेय पृ. क्र. 67
25ण् छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय संपादक डाॅ. बलदेव पृ. 71
26ण् पं. मुकुटधर पाण्डेय चयनिका संपादक प्रो. दिनेष पाण्डेय और डाॅ. बिहारीलाल साहू पृ.क्र. 110
Received on 06.08.2019 Modified on 07.09.2019
Accepted on 30.09.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(4):756-760.